
“सहजता का स्पर्श” कहानी – Family Responsibility Story
रविवार की सुबह थी। बारिश हल्की-हल्की बरस रही थी और हवा में मिट्टी की मीठी-सी सुगंध तैर रही थी। घर का माहौल हर रविवार की तरह व्यस्त होना चाहिए था, लेकिन आज कुछ अजीब-सी खामोशी थी।
सुबह के नौ बजे थे, और माया रसोई में बिल्कुल धीमे-धीमे काम कर रही थी — जैसे किसी ने उसके भीतर से सारी हड़बड़ी खींच ली हो।
उसका पति, विनय, अख़बार लिए बैठा था। अचानक वह बोला,
“माया, मैं आज दोस्तों के साथ आउटिंग पर जा रहा हूँ। दो-तीन घंटे लग जाएंगे।”
बहुत वर्षों से माया की पहली प्रतिक्रिया वही रही थी —
“इतनी लंबाई क्यों?”
“खाना कौन बनाएगा?”
“बच्चों को छोड़ने भी जाना है…”
लेकिन आज उसने सिर उठाकर शांत स्वर में कहा,
“ठीक है। आराम से जाओ।”
विनय के हाथ से अख़बार फिसला।
“इतना सिंपल? इतना आसानी से ‘ठीक है’?”
वह हैरान था, पर चुप रहा।
दोपहर तक घर में एक और “अप्रत्याशित” घटना हुई।
उनका बड़ा बेटा, आरव, जिसकी बोर्ड एग्ज़ाम की तैयारी चल रही थी, हाथ में मार्कशीट लिए खड़ा था। चेहरे पर निराशा और डर दोनों।
“माँ… मेरे टेस्ट में बहुत कम नंबर आए हैं,” वह बोला,
“मुझे पता है, तुम नाराज़ हो जाओगी… लेकिन मैं कोशिश कर रहा था।”
माया ने उसे ध्यान से देखा।
“ठीक है।”
आरव सन्न रह गया।
“ठीक है? मतलब… कुछ कहोगी नहीं? डाँटोगी नहीं?”
वह मुस्कुराई।
“बेटा, नंबर तुम्हारे हैं। मेहनत भी तुम्हें ही करनी है।
मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूँ, लेकिन तुम्हारी पढ़ाई मैं नहीं पढ़ सकती।
अगर कम आए हैं, तो सीखने की गुंजाइश है।
बस इतना याद रखो — ये तुम्हारी ज़िम्मेदारी है, मेरी नहीं।”
आरव ने पहली बार माया की आँखों में एक अजीब-सी स्पष्टता देखी।
शाम तक तीसरी घटना घटी।
उनकी छोटी बेटी, अन्वी, जो स्कूटर सीख रही थी, घबराई-सी घर में दाख़िल हुई।
“मम्मी… वो… मैंने स्कूटर खंभे से टकरा दिया।”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“पीछे का हिस्सा थोड़ा टूट गया है। मैं… मैं डर गई थी।”
माया फिर भी शांत थीं।
“ठीक है। कल मैकेनिक को दिखा देना।”
अन्वी की आँखें फैल गईं।
“बस? तुम नाराज़ नहीं हो?”
“नहीं,” माया ने सहजता से कहा।
“टेंशन लेने से स्कूटर ठीक नहीं होता।
लेकिन अगली बार थोड़ा सावधान रहना।”
अन्वी को विश्वास ही नहीं हुआ।
ये वही माँ है, जो पहले उसके हर काम पर टोकती थी?
तीनों — पति, बेटा, बेटी — अब परेशान होने लगे थे।
यह बदलाव कोई मामूली बात नहीं थी।
अगले दिन रात को सबने माया को ड्रॉइंग रूम में बुलाया।
विनय ने पूछा,
“माया, क्या हुआ है? तुम इन दिनों जैसे बिल्कुल बदल गई हो।
कुछ भी हो, तुम शांत रहती हो, गुस्सा नहीं करती।
क्या सब ठीक है?”
माया ने गहरी साँस ली और मंद मुस्कान के साथ बोली—
“हाँ, सब बिल्कुल ठीक है।
बस… मैंने जीना सीख लिया है।”
तीनों चौंक गए।
“मतलब?” आरव ने पूछा।
माया कुर्सी पर थोड़ा पीछे टिक गई और बोली—
“सालों तक मैं हर बात पर चिंता करती रही।
तुम देर से आते थे, तो मैं बेचैन हो जाती।
बच्चों के मार्क्स कम आते, तो लगता जैसे मेरी गलती हो।
घर में कुछ टूट जाता, तो मैं घबरा जाती।
किसी का मूड खराब हो जाए, तो मैं तुरंत खुद को दोष देने लगती।
फिर एक दिन एहसास हुआ —
मैं अपनी शांति गँवाकर भी किसी की ज़िंदगी आसान नहीं कर पा रही।”
विनय और बच्चे सुनते रहे।
“तुम देर से आते हो —
तो उसमें मेरी बेचैनी तुम्हें सही समय पर नहीं ला सकती।
बच्चों के कम नंबर आए —
तो मेरी फटकार पढ़ाई नहीं बढ़ा सकती।
स्कूटर टूट गया —
तो चिल्लाने से ठीक नहीं होगा।
मैंने देखा… मेरी टेंशन, मेरा ग़ुस्सा, मेरी हड़बड़ी
किसी की भी समस्या हल नहीं करता था।
बस घर का वातावरण खराब हो जाता था,
और मैं खुद भी दुखी हो जाती थी।”
वह रुकी, फिर बोली—
“फिर मुझे समझ आया —
हर इंसान अपनी ज़िंदगी खुद चलाता है।
मैं सिर्फ साथ चल सकती हूँ,
उनकी जगह चल नहीं सकती।”
आरव धीरे से बोला,
“लेकिन अगर तुम्हें गुस्सा नहीं आता…
तुम्हें फर्क नहीं पड़ता?”
माया ने उसके काँधे पर हाथ रखा।
“फर्क बहुत पड़ता है, बेटा।
लेकिन फ़र्क पड़ना और परेशान होना —
ये दो अलग बातें हैं।
मैं अब तुम्हें समझाती हूँ,
तुम्हारी मदद करती हूँ,
लेकिन तुम्हारी जगह चिंता नहीं करती।
तुम्हारी पढ़ाई — तुम्हारी ज़िम्मेदारी।
तुम्हारी गलतियाँ — तुम्हारी सीख।
तुम्हारे फैसले — तुम्हारा भविष्य।
और बिल्कुल यही बात आप सब पर लागू होती है।”
तीनों के चेहरे पर सोच की छाया थी।
माया ने चाय का कप उठाया और मुस्कुराई—
“मैंने बस इतना तय किया:
जो मेरे नियंत्रण में है, वही करूँगी।
जो नहीं है, उसके लिए परेशान नहीं होऊँगी।
क्योंकि चिंता, गुस्सा, चिल्लाना —
ये समाधान नहीं बनते।
ये सिर्फ माहौल को भारी कर देते हैं।”
कुछ देर सन्नाटा रहा।
माया के शब्द जैसे घर की दीवारों में उतर गए थे।
उस रात कुछ बदला।
आरव ने अपनी किताबें दुबारा खोलीं —
इसलिए नहीं कि उसे डर था,
बल्कि इसलिए कि उसने जिम्मेदारी महसूस की।
अन्वी ने स्कूटर की मरम्मत खुद कराने की योजना बनाई —
क्योंकि उसे लगा कि स्वयं संभालना सीखना महत्वपूर्ण है।
विनय अगले दिन दफ़्तर से निकलते समय
खुद ही फोन करके बता गया कि वह देर से आएगा —
क्योंकि अब कोई दबाव नहीं था,
बस आपसी समझ थी।
अगले कुछ हफ़्तों में घर जैसे हल्का-हल्का होने लगा।
लोग डर से नहीं, समझ से बात करने लगे।
गलतियाँ हुईं, पर डर नहीं लगा।
ज़िम्मेदारी आई — मजबूरी नहीं।
एक दिन विनय ने माया से कहा—
“तुम्हारी शांति… इस घर की हवा बदल रही है।”
माया ने हँसकर कहा,
“क्योंकि शांति भी एक तरह का संक्रमण है।
जैसे एक व्यक्ति तनाव फैलाता है…
वैसे ही एक व्यक्ति शांति भी फैला सकता है।”
उसने विनय का हाथ थामा।
“और मैंने तय कर लिया है —
मैं वही फैलाऊँगी।”
विनय, आरव और अन्वी तीनों मुस्कुरा उठे।
इस बार ये मुस्कान मजबूरी की नहीं,
बल्कि समझ की थी।
कहानी की सीख
जब हम दूसरों की ज़िंदगी को नियंत्रित करने का प्रयास छोड़ देते हैं,
और सिर्फ प्रेम, मार्गदर्शन और भरोसा देते हैं,
तो घर में तनाव नहीं — शांति पनपती है।
हर इंसान अपने निर्णय और परिणाम का मालिक है।
हमारी चिंता किसी की समस्या नहीं सुधारती —
बस हमारी शांति छीन लेती है।
और जब घर में एक व्यक्ति शांति अपनाता है —
तो उसका असर पूरे घर पर फैल जाता है।









