
कहानी: “क्योंकि आज वो घर पर है…”
सुबह की धूप परदे की दरार से कमरे में आ रही थी, पर कमरा जैसे कई दिनों से धूप देखना ही भूल गया था। अविनाश बिस्तर से उठकर रसोई की ओर गया, और वही रोज वाली लड़ाई शुरू हो गई—
खाली गैस पर चाय का भगोना, सिंक में बर्तन का पहाड़, और किचन की कच्ची-पक्की महक।
उसने बुदबुदाते हुए कहा—
“यार… यह अकेले रहना भी एक किस्म की सज़ा है।”
खुद के लिए चाय बनाना उसे कभी अच्छा नहीं लगा। स्वाद भी खराब, मन भी। फिर भी किसी तरह बनाकर दो घूँट पीने की कोशिश की। पर चाय ऐसी थी जैसे दवाई हो—गले से उतर ही न रही हो।
वह रोज घर से ऐसे ही निकलता था—अधूरी चाय, गंदा घर और खाली मन लेकर।
आज भी उसी बोझिल मन के साथ दफ़्तर के लिए तैयार हुआ। लापरवाही और थकान से भरी दिनचर्या जैसे उसके जीवन का हिस्सा बन चुकी थी। कपड़े ढूँढते हुए उसे पता चला कि कल वाले ही शर्ट-पैंट आज फिर पहनने पड़ेंगे। अलमारी में साफ कपड़ों का नामोनिशान नहीं था।
वह हमेशा सोचता था—
“वीकेंड में सब कर लूँगा।”
पर हर वीकेंड वही होता—नींद, आलस, और बढ़ती अव्यवस्था।
ऑफिस पहुँचा तो तन से ज्यादा मन थका हुआ था। काम के बीच-बीच में वह घर की गंदगी, कपड़ों के ढेर और खालीपन को याद कर मन ही मन झुँझलाता रहता।
शाम तक आते-आते सिर दर्द ने भी साथ पकड़ा लिया।
ऑफिस से लौटते हुए सब्जी मंडी से कुछ सामान लिया—टमाटर, आलू, प्याज—बस इतना ही कि किसी तरह रात की मैगी में मिल जाएँ। फिर एक दूध का पैकेट, और वही रोज़ की थकान को ढोता हुआ वह घर की ओर चला।
घर के सामने पहुँचकर उसने बैग नीचे रखा और हमेशा की तरह ताले में चाबी डालने लगा। लेकिन दरवाज़ा तो पहले से ही खुला था।
अविनाश अचकचा गया।
“ताला खुला? चाबी तो मेरे पास है… फिर…?”
एक पल को दिल की धड़कन जैसे रुक गई। वह धीरे-धीरे अंदर दाखिल हुआ।
पहला ही कदम अंदर रखा और जैसे पैरों के नीचे बादल आ गए।
घर… चमक रहा था।
उसने चारों ओर नज़र घुमाई और अविश्वास में आँखें बड़ी कर लीं।
फर्श ऐसा चमक रहा था जैसे अभी-अभी पोछा हुआ हो।
हल्की-हल्की अगरबत्ती की खुशबू वातावरण में तैर रही थी।
सोफ़े पर वे कुशन पड़े थे जिन्हें उसने महीनों से ठीक से देखा तक नहीं था—आज करीने से सजे हुए थे।
उसने फ्रीज खोला—
अरे! फ्रीज भी साफ!
अंदर ताज़ी सब्जियाँ सजी थीं। कल का उबला अंडा भी डिब्बे में ढका हुआ रखा था।
कोने में रखा अचार रखने वाला जार चमक रहा था।
ऊपर की शेल्फ पर गेहूँ का डिब्बा साफ, नीचे की ट्रे में फल।
अविनाश अवाक खड़ा रहा।
“ये सब… कैसे?”
वह आगे बढ़ा और बाथरूम में झाँका—बिला हुई गंदगी, साफ़ तौलिया, और साबुन की मीठी खुशबू।
फिर आँखें अलमारी पर पड़ीं—
उसे याद आया, उसमें तो कपड़ों का पहाड़ था!
अलमारी खोली—
और एक झटका-सा लगा।
सभी कपड़े धुले हुए, इस्त्री किए हुए, रंग के अनुसार सजे हुए!
नीली शर्ट के पास नीली शर्ट, सफ़ेद शर्ट के पास सफ़ेद।
सॉक्स की जोड़ी अलग से।
रुमाल एक जगह करीने से।
पतलून एकदम खिंची-खिंची सी।
उसकी आँखें नम होने लगीं।
“यह सब किसने…?”
किचन में गया तो गैस पर एक बर्तन रखा था—ढक्कन से हल्की भाप निकल रही थी।
अंदर से मसालों की खुशबू आ रही थी जैसे घर लंबे समय बाद फिर खाना पकाने की आवाज़ सुन रहा हो।
किचन सिंक चमक रहा था।
वो सिंक जो पिछले कई दिनों से उसके लिए जैसे अपराधबोध की कहानी सुनाता था।
पल भर को उसने सोचा—
“कहीं गलत घर में तो नहीं आ गया?”
लेकिन फ्रिज पर चिपका उसका पुराना हिलता हुआ मैगनेट, दीवार पर लगी उसकी पसंदीदा पेंटिंग—सब उसके ही थे।
तभी पीछे से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
वह मुड़ा—
माँ वहाँ खड़ी थीं।
हल्की मुस्कान, थकान भरी आँखें, लेकिन चेहरे पर वही पुरानी, न मिटने वाली ममता।
वह दौड़कर माँ के पास गया।
“माँ… आप… आप कब आईं?”
“सुबह,” माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हारे कमरे की हालत देखी तो समझ गई कि मेरा बेटा सिर्फ बाहर से बड़ा आदमी बन गया है, अंदर से अभी भी बच्चा ही है।”
अविनाश सुनता रहा, आँसू आँखों से गिरते रहे।
माँ ने कहा—
“पहले खाना खा लो, फिर बातें करते हैं।”
माँ ने टेबल पर गरमा-गरम पकौड़े रखे। भाप उड़ रही थी।
फिर एक कप चाय सामने सरका दी—वो चाय, जो अविनाश सालों से नहीं पी पाया था—माँ के हाथों की।
वह कुर्सी पर बैठा।
पकौड़े का पहला कौर मुँह में डालते ही गले में कुछ अटक-सा गया।
सालों बाद वह स्वाद, वह सुकून, वह अपनापन जैसे दिल को पिघला रहा था।
बिना चाहे ही दो आँसू गिर पड़े।
माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“रो क्यों रहा है?”
अविनाश के होंठ कांपे।
“माँ… घर जैसा घर सिर्फ आपके होने से लगता है। मैंने इतनी अकेली ज़िंदगी क्यों जी? आप क्यों नहीं बताया आपने कि आपका आना ही सबसे बड़ा सुख है?”
माँ ने मुस्कुराते हुए कहा—
“पहले तेरा घर बुलाता तो सही…”
अविनाश झुककर माँ की गोद में सिर रख दिया।
कितना समय हो गया था ऐसा किए?
उस पल उसे समझ आया—
घर वो स्थान नहीं जहाँ दीवारें हों।
घर वो होता है जहाँ ममता हो।
जहाँ कोई आपको जानता हो, संभालता हो, आपकी अव्यवस्था से भी आपसे प्यार करे।
चाय और पकौड़ों की सुगंध के बीच उसके मन में एक ही वाक्य गूँज रहा था—
“क्योंकि आज वो घर पर है…”
कहानी का संदेश
स्त्री किसी भी रूप में हो—
माँ, पत्नी, बहन, बेटी, दादी, बहू—
लेकिन जहाँ भी होती है,
उस जगह को मकान से घर बना देती है।
जिस दिन वह पास होती है,
जीवन भी जैसे हाथ पकड़कर कहता है—
“अब सब ठीक है, क्योंकि आज वो घर पर है…”






